मंगल पर Nasa रोवर को उतारा भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक ने !!

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मंगल पर Nasa रोवर को उतारा भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक ने !!
मंगल पर Nasa रोवर को उतारा भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक ने !!

स्वाति मोहन, भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक जिन्होंने मंगल पर Nasa रोवर को उतारा, वह स्टार ट्रेक से एक बच्चे के रूप में प्रेरित थी

अमेरिका : Nasa के मंगल ग्रह पर भेजे गए रोवर परसिवरेंस की सफलता के पीछे जिन लोगों का हाथ है उनमें से एक स्‍वाति मोहन भी हैं। स्‍वाति मोहन Nasa की जेट प्रपल्‍शन लैब में इस प्रोग्राम की नेवीगेशन गाइडेंस और कंट्रोल ऑपरेशन (GNC) की हैड हैं. Nasa का रोवर इसी लैब में तैयार किया गया है.

इसके पीछे वर्षों की मेहनत है। Nasa के इस मिशन में रोवर परसिवरेंस के साथ एक मिनी हैलीकॉप्‍टर इनज्‍यूनिटी भी सफलतापूर्वक मंगल ग्रह पर पहुंच गया है। ये इस पूरी टीम के लिए गौरव का पल है. स्‍वाति की बात करें तो वो इसकी टीम से बीते आठ वर्षों से जुड़ी हैं.

स्‍वाति के ऊपर मार्स रोवर परसिवरेंस को सही जगह पर उतारने और इसके लिए एकदम सही जगह का चयन करने की जिम्‍मेदारी थी. वो केवल इसी मिशन के साथ जुड़ी नहीं रही है बल्कि इससे पहले वो शनि ग्रह पर भेजे गए कासिनी यान और Nasa के चांद पर भेजे गए ग्रेविटी रिकवरी एंड इंटीरियर लैबोरेटरी (ग्रेल) यान से भी जुड़ी रह चुकी हैं.

 

मंगल ग्रह की सतह पर एक कठिन लैंडिंग

जैसा कि दुनिया ने देखा कि मंगल ग्रह की सतह पर एक कठिन लैंडिंग हो रही है, स्वाति मोहन ने अपने शांत और आत्म-स्वरूप में संचालन के माध्यम से कदम रखा। बिंदी-पहने स्वाति मोहन ने जीएन एंड सी सबसिस्टम और मील के पत्थर की परियोजना की अन्य टीमों के बीच संवाद और समन्वय किया.
जिस वक्‍त उनकी वर्षों की मेहनत को मंगल ग्रह के लिए लॉन्‍च किया जाना था. उस वक्‍त वो और उनकी पूरी टीम काफी नर्वस हो गई थी. इसकी वजह थी कि मंगल की पथरीली सतह पर उनका रोवर कितनी सफलता से उतरेगा. उनके और उनकी टीम में इस दौरान कई तरह के विचार आ रहे थे.

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इनमें एक ये भी था कि यदि किसी गलती की वजह से मिशन नाकाम रहा तो उनकी वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा. उनकी वर्षों की मेहनत रोवर परसिवरेंस की लैंडिंग के आखिरी 7 मिनट पर टिकी हुई थी, क्‍योंकि ये पल बेहद मुश्किलों भरे थे. इस रोवर एक ऐसी जगह पर उतरना था जो बेहद पथरीली थी और जहां पर बड़ी-बड़ी चट्टानें और बड़े बड़े पत्‍थर थे। यहां पर वो सबकुछ था जो रोवर को नुकसान पहुंचा सकता था.

प्रोग्राम स्‍टार ट्रेक ने दी प्रेणा

अपने वैज्ञानिक बनने और Nasa से जुड़ने की बात का खुलासा करते हुए एक बार उन्‍होंने कहा था कि वो जब 9 वर्ष की थीं तब टीवी पर आने वाले प्रोग्राम स्‍टार ट्रेक को बेहद मन से देखा करती थीं.

इससे उन्‍हें ब्रह्मांड के नए खुलासे करने का मन करता था। उन्‍हें ये जानने में अच्‍छा लगता था कि पृथ्‍वी से करोड़ों किमी दूर भी कुछ है। यहां से उन्‍हें ब्रह्मांड को खंगालने की धुन सवार हुई थी. उन्‍हें लगने लगा था कि उन्‍हें भी इस ब्रह्मांड के नए सवालों का जवाब तलाशने हैं. जब वो 16 वर्ष की थीं तब उनके दिमाग में पैड्रीटिशियन बनने का ख्‍याल आया.

लेकिन इसी दौरान उन्‍हें मिले फिजिक्‍स के टीचर की बदौलत उनके मन में दोबारा इंजीनियर बनने का ख्‍याल मन में आया था. इसके बाद उनकी दिलचस्‍पी स्‍पेस एक्‍सप्‍लोरेशन में बढ़ती ही चली गई. अमेरिका में जा बसीं स्वाति ने मैसेच्यूसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से ऐरोनॉटिक्स/ऐस्ट्रोनॉटिक्स में Ph.D की है.

मंगल से पहले चंदा और शनि पर किया काम

वह मंगल से पहले शनि के Cassini और चांद के GRAIL मिशन के लिए काम कर चुकी हैं. Perseverance मिशन के साथ वह साल 2013 से जुड़ी हैं। पैसेडीना में जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी में काम कर रहीं स्वाति बताती हैं कि यहां इंसान की समझ को विस्तृत करने की कोशिश की जाती है और हमेशा कुछ नया खोजा जाता था. वह कहती हैं कि यहां काम करना सम्मान की बात है। इस तरह के माहौल में काम करने से काफी प्रेरणा मिलती है.

एक साल की उम्र में अमेरिका आयी थीं

Nasa वैज्ञानिक स्वाति मोहन उस समय अमेरिका गई थीं, जब वह सिर्फ एक साल की थीं। बड़े होने के दौरान, उन्होंने उत्तरी वर्जीनिया-वाशिंगटन डीसी मेट्रो क्षेत्र में अपना बचपन बिताया। 9 साल की उम्र में, पहली बार ‘स्टार ट्रेक’ देखने के बाद, वह ब्रह्मांड के नए क्षेत्रों के सुंदर चित्रण से काफी चकित थी, जो वे खोज रहे थे। उसने तुरंत महसूस किया कि वह ऐसा करना चाहती थी और “ब्रह्मांड में नए और सुंदर स्थान ढूंढ रही थी”.

कई Nasa परियोजनाओं पर काम करने के बाद, स्वाति मोहन ने लाल ग्रह पर प्राचीन जीवन के संकेत खोजने के लिए मंगल ग्रह से चट्टानों को वापस लाने के लिए अपने सबसे महत्वाकांक्षी मिशनों में से एक का नेतृत्व किया।

Nasa रोवर नारंगी मार्टियन आकाश के माध्यम से लहराया और शुक्रवार को ग्रह पर उतरा, दुनिया भर में चीयर्स भेज रहा है। सिग्नल को पृथ्वी तक पहुँचने में 11 1/2 मिनट का समय लगा।

Written By Somyata Bisht

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